गया जी श्राद्ध

गया जी श्राद्ध

गया जी तीर्थ है। हिन्दू धर्मावलंबियों का विश्वास है कि पिंडदान करने से उनके पितरों को स्वर्गलोक में स्थान मिलेगा। मेरे अनेक मित्र मुझसे जानकारियाँ माँगते रहते हैं।
मुझे भी यहाँ रहते हुए 20 साल से ऊपर हो गए। चूँकि मैं संस्कृत-पालि का छात्र हूँ और समाज, संस्कृति, साधना जैसे विषयों में रुचि रखता हूँ। अतः मित्रों की अपेक्षा सहज है। अलग-अलग लोगों के प्रश्न अलग, जिज्ञासाएं अलग, तो मैं ने सेाचा कि इंटरनेट के जमाने में क्यांे न इन्हंे एक ब्लॉग बनाकर डाल दूँ। मित्रों के एवं उनके मित्रों के भी काम आएगा।
गया को लोग आदरपूर्वक गयाजी कहते हैं। यहाँ पिंडदान करने के लिए आने के पूर्व न केवल गया के बारे में बल्कि आपको अपने देश, कुल, धर्म, तीर्थ एवं मृत्यु के बाद की अवस्था के बारे में भी आरम्भिक एवं मौलिक जानकारियाँ होनी चाहिए तभी तो समझ सकेंगे कि गया-पिण्डदान से जुड़ी बातों का मतलब क्या है; जैसे –

1. पितर एवं देवता
2. मरणोत्तर जीवन की अवधारणा एवं श्राद्ध
3. स्वर्ग और मुक्ति, तथा उनका अंतर
4. कीकट क्षेत्र एवं गयाजी तीर्थ की स्थिति/भूगोल
5. गया-तीर्थ की धार्मिक-सामाजिक संरचना
6. पितृ-पार्वण श्राद्ध की मूल सामग्री
7. तीर्थवृत्ति-सुधार आंदोलन एवं विविध संगठन
8. आधुनिक समाज की समस्याएँ एवं उनका समाधान करने के सूत्र

गया श्राद्ध संबंधी जानकारी के पहले कुछ मोटी बातें
संस्कार की समझ –
श्राद्ध एक संस्कार है। संस्कार नैमित्तिक कर्म हैं जो जन्म, मृत्यु आदि घटनाओं पर आधारित होते हैं। संस्कार की आज समझ समाप्त हो गई है। लोग लोकलज्जा निवारण हेतु येन केन प्रकारेण संस्कार पूरा करते हैं। चूँकि वास्तविक या केवल लोकलज्जा निवारण हेतु किये गये, दोनों प्रकार के संस्कार में कुछ न कुछ संस्कार तो मन में पड़ता ही है अतः स्थिति स्पष्ट करते हुए सभी संस्कार के दो प्रकार हो सकते हैं – सर्वांगीण और निर्वाहनात्मक अर्थात् केवल लोकलज्जा निवारण हेतु ।
वास्तविक/ सर्वांगीण – सर्वांगीण संस्कार वह है, जिसमें संस्कार की पूरी प्रक्रिया संपन्न की जाय और यह निश्चित किया जाय कि जिस उद्देश्य से जो संस्कार किया जा रहा है, वह ठीक से पूरा हो जाए।
इस प्रकार के संस्कार के अनुष्ठान की पूरी प्रक्रिया का पुनः निर्धारण आवश्यक है क्योंकि आज की जितनी संस्कार पद्धतियाँ चलन में हैं, उनमें संस्कार की ठीक समझ नहीं है और वे सभी निर्वाह तक सीमित हो गई हैं। जो लोग ठीक से संस्कार करना-कराना चाहते हैं, उनके लिए इस प्रकार की विधियाँ अनुकूल होंगी। धीरे- धीरे अन्य लोग भी संस्कार के महत्व को समझकर विधिवत संस्कार आदि अन्य अनुष्ठानों की ओर प्रवृत्त होंगे। अनेक लोग जानकारी एवं समझ के अभाव में सामर्थ्य एवं श्रद्धा होने पर भी सही संस्कार नहीं करा पाते हैं।
निर्वाहनात्मक – बहुत सारे गरीब, मजबूर, परदेशी आदि लोगों के पास न समय होता है, न सामर्थ्य, और न इस बात की चिंता रहती है कि मन, वाणी और शरीर पर कोई संस्कार निर्मित हो रहा है या नहीं ?। उनके संस्कार केवल श्रद्धामूलक है या सामाजिक मजबूरी। ऐसे लोगों पर विधि पूर्वक अनुष्ठान का दबाव डालना जरूरी नहीं है।
ऐसे लोगों के लिए श्रद्धामूलक संक्षिप्त कर्मकाण्ड का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिससे जो भी परिणाम हो शुभ हो। उनके चित्त में जटिलता, ग्लानि, कपट, ऋण आदि का बोझ उत्पन्न न हो, न ही समाज में संस्कारों के बारे में भ्रातियाँ उत्पन्न हों।

गया श्राद्ध की अनिवार्यता
देवताओं को भी सारे सुख उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें भी सीमाओं का पालन करना पड़ता है। उन्हें भय सताता है कि देवत्व का क्षय न हो जाय और ईष्या भी तंग करती है क्योंकि बड़े-छोटे, स्वामी-दास का भाव वहाँ भी है। आधुनिक दृष्टि से सोंचे तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो इन्द्र का भी नौकर बनने की जगह मृत्युलोक में स्वतंत्र रहना या दुकानदारी करना पसंद करेंगे।
गीता भी स्वर्ग को त्रिगुणात्मक मानती है और उससे ऊपर उठने को कहती है। सुख-दुःख पाप-पुण्य जैसे द्वन्द्व अकेले रहते ही नहीं।
स्वर्ग के सदृश अवस्थाओं की भी मान्यता है, जैसे गोलोक, विष्णुलोक, शिवलोक आदि। ऐसे में ईमानदार धर्मशास्त्री को किसी एक परंपरा के पक्ष में नहीं पड़ना चाहिए। चाहे तो कोई अपने पिता को स्वर्गलोक, विष्णुलोक या गोलोक में स्थापित करने का अनुष्ठान करे या न करे। गया का पिंडदान त्रिणुणातीत ब्रहमैक्य की भावना वाले भक्ति का अनुष्ठान नहीं है। तादात्म्य केवल शैव परंपरा में है या निर्गुण ब्रहम की उपासना में। विष्णुलोक में तो पार्षद होने तक की ही अधिकतम सुविधा है। हां, व्यूह की एकता, सख्य भाव एवं गोलोक की मानसिकता अलग है।
अतः धर्मशास्त्र में मोक्ष के स्वरूप के वर्णन के साथ उसके अनुष्ठान का वर्णन होना चाहिए। पुराण, उपपुराण या अनुष्ठान पद्वतियाँ किसी एक परंपरा से नियत्रिंत होती हैं और इस तरह वर्णन करती हैं मानों दूसरा है ही नहीं। धर्मशास्त्र चूँकि विविधतापूर्ण समाज के लिये होता है अतः उसे किसी एक का पक्ष नहीं लेना चाहिए।

गया श्राद्ध की तिथि एवं मुहूर्त
गया में पुण्यकर्म के विधान के लिए ज्योतिष संबंधी मान्यताओं में भी अंतर है। यहाँ विवाहादि शुभ कर्मों के लिए भी गुरु का उदित होना जरूरी नहीं है। गया या मगध में यह सर्वत्र नियम है। इतना ही नहीं, जो लोग मगध के बाहर से भी आते हैं वे भी मगध की इस परंपरा की मर्यादा को मानते हैं।
न त्यक्तव्यं गयाश्राद्धं सिंहस्थे च वृहस्पतौ।
अधिमासे सिंह-गुरावस्ते च गुरु-शुक्रयोः।
तीर्थयात्रा न कर्तव्या गयां गोदावरीं विना।
(वायुपुराण)
(वृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने, अधिक मास, सिंह या गुरु के अस्त होने पर भी या गुरु-शुक्र दोनों के अस्त रहने पर गया एवं गोदावरी के अतिरिक्त तीर्थयात्रा नहीं करनी चाहिए।